नई दिल्ली. राजस्थान सरकार और प्रदेश कांग्रेस में एक संभावित राजनीतिक उठापटक और उथल-पुथल पर सबकी नजरें हैं. मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और सचिन पायलट इसका मास्टर प्लान तैयार करने में लगे हैं. बसपा के छह विधायकों को हाल में कांग्रेस में शामिल करवाकर गहलोत ने अपने आप को और मजबूत कर लिया.
बसपा से कांग्रेस में शामिल हुए छह विधायकों को कौन सा पद दिया जाए? किन खराब परफोर्मेंस वाले मंत्रियों को आउट किया जाए? किनका प्रमोशन किया जाए? इसके अलावा सत्ता में आने के साथ ही जो निर्दलीय विधायक उनके साथ रहे, जो विधायक लगातार अच्छी परफोर्मेंस दे रहे हैं उनका कैसे उत्साहवर्धन पार्टी और संगठन में पद दे कर किया जाए? यह सबसे बड़ी चुनौती है.यह भी तय होगा कि खुद 9 विभागों की जिम्मेदारी संभाल रहे मुख्यमंत्री अपने पास मौजूद कुछ विभाग किसे देते हैं. सचिन पायलट यदि उप मुख्यमंत्री रहते हैं तो क्या उनके कुछ विभाग भी किसी और मंत्री को दिए जाएंगे या वो पार्टी अध्यक्ष बनते हैं तो उनके सभी 5 विभागों को कैसे सर्कुलेट किया जाएगा.
खबर यह भी है कि बीडी कल्ला जैसे वरिष्ठ नेताओं का बोझ थोड़ा कम किया जा सकता है. खुद मुख्यमंत्री भी अपने पास से कुछ डिपार्टमेंट मंत्रियों में बांट सकते हैं. राजस्थान में दो उप मुख्यमंत्री बनाए जाने के चर्चे भी जोरों पर हैं. सचिन पायलट पर एक व्यक्ति एक पद के सिद्धांत के तहत दबाव बढ गया है, पायलट या तो प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष रहेंगे या उप मुख्यमंत्री.
कांग्रेस के गलियारों में चर्चा है कि किसी आदिवासी और जाट चेहरे को पार्टी या सरकार में अहम पद देने की तैयारी है. यदि पायलट उप मुख्यमंत्री पद छोड़ते हैं तो दलित और आदिवासी नेता के तौर पर खाद्य एवं आपूर्ति मंत्री रमेश मीणा का नाम उप मुख्यमंत्री पद पर सबसे पहले है. इस नाम के साथ ही राजस्व मंत्री हरिश चौधरी को भी उप मुख्यमंत्री बनाए जाने के चर्चे जोरों पर हैं. इससे दो बड़े वर्गों को सीधा साधने का मौका मिलेगा. यह दोनों ही नाम उप मुख्यमंत्री के तौर पर प्रमुखता से एआईसीसी के गलियारों में गूंज रहे हैं. सूत्रों की माने तो इन दोनों ही नेताओं का फीडबैक लगातार कांग्रेस आलाकमान प्राप्त करता रहता है, और सीधे कई बार कई मसलों पर बातचीत भी दोनों ही नेताओं से की जाती है. उधर दोनों ही नेताओं ने अपनी ईमानदार और दबंग छवि के जरिए खुद को साबित किया है जिससे गहलोत खुद भी दोनों का ही प्रमोशन जातीय समीकरण और स्वच्छ छवि वाले नेता के तौर पर करना चाहते हैं. आदिवासी नेताओं में महेंद्रजीत सिंह मालवीय का नाम भी चर्चा में है.
जानकार बताते हैं कि यदि पायलट उप मुख्यमंत्री रहते हैं तो फिर किसी जाट या आदिवासी नेता को पीसीसी अध्यक्ष बनाया जाएगा और एक को उप मुख्यमंत्री. ऐसे में पायलट के समकक्ष गहलोत एक और नेता को खड़ा कर खुद को मजबूत करेंगे, वहीं मतदाता को भी साधना चाहेंगे. कैबिनेट मंत्री लालचंद कटारिया को भी मंत्रिमण्डल से मुक्त करके जाट चेहरे के तौर पीसीसी चीफ बनाने पर चर्चा हो चुकी है. ऐसा इस लिहाज से भी जरुरी हो गया है क्योंकि बीजेपी ने अपना प्रदेशाध्यक्ष सतीश पूनिया को बनाया है जो जाट बिरादरी से जुडे हैं.
जानकारी के अनुसार अक्टूबर महीने में एक बड़ा फेरबदल हो सकता है. इस बात की संभावना जताई जा रही है और बताया जा रहा है कि निकाय और पंचायती राज चुनावों से पहले ही मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने मंत्रिमंडल और प्रदेश कांग्रेस के संगठन में फेरबदल करने के लिए कांग्रेस के कार्यकारी अध्यक्ष सोनिया गांधी से मुलाकात करी है और इसका एक प्रस्ताव उन्हें भेज भी दिया है. गहलोत ने प्रदेश में दो उप मुख्यमंत्री बनाने के साथ-साथ करीब दर्जन खरा दर्जनभर नेताओं जो उनका खराब प्रदर्शन रहा है उन्हें मंत्रियों के पद से हटाने का प्रस्ताव सोनिया गांधी को भेज दिया है. वहीं बताया जा रहा है कि गहलोत का यह मानना है कि भारतीय जनता पार्टी की ओर से पहली बार जाट को प्रदेश अध्यक्ष बनाने के बाद कांग्रेस पर अब दबाव बन गया है उन्होंने सोनिया गांधी के समक्ष राज्य में एक व्यक्ति एक पद सिद्धांत को लागू करने की मांग पर भी जोर दिया है. जिसके बाद सचिन पायलट से राजस्थान के प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष पद या फिर प्रदेश के उप मुख्यमंत्री का पद छिन सकता है. ऐसे में माना जा रहा है कि सबकुछ ठीक रहा तो गहलोत अपनी बिसात बिछाने में कामयाब हो जाएंगे. हालांकि बोल्ड, ईमानदार और स्वच्छ छवि वाले मंत्री रमेश मीणा और पार्टी के लिए लम्बे समय से समर्पित स्वच्छ छवि वाले हरिश चौधरी दोनों ही पायलट और गहलोत का सम्मान करते हैं.
प्रदेश अध्यक्ष के तौर पर लालचंद कटारिया भी गहलोत की गुड बुक में शामिल हैं. ऐसे में देखना दिलचस्प होगा कि गहलोत की इस बिसात में पायलट क्या करिश्मा कर पाते हैं और खुद को मजबूत कैसे रख पाते हैं. खैर आलाकमान कुछ भी फैसला करें लेकिन सचिन पायलट की राय और अनदेखी करके कभी भी अशोक गहलोत के फैसले पर आंख मूंदकर निर्णय आलाकमान नहीं लेगा.